मित्रता एक सात्विक भाव है जो मानस सागर की गहराइयों से उठकर मस्तिष्क के आकाश का स्पर्श करता है आज ऐसा भाव कम देखने को मिलता है आज मित्रता का आधार स्वार्थ है या वासना | राम ने वनवास के समय पशु पक्षी नर वानर सब उनके थे |मित्रता के इसी भाव से कृष्ण अर्जुन के सारथी बने सुदामा के चरण अश्रु जल से धोये मित्र भाव ने चावल के दाने पर सारा सुख दे दिया द्रौपदी को सखी माना और उसकी लाज बचाई | मित्र की परख कष्ट की कसौटी पर ही होती है विश्व मित्रता दिवस पर यही कामना है कि सारी वसुधा एक परिवार बन जाए | सभी मित्रों को नमन
रविवार, 3 अगस्त 2014
शनिवार, 2 अगस्त 2014
jyotit
सूर्य की पहली किरण को नमस्कार सबके लिए आज का दिन शुभ हो |
सरस्वती वंदन ----मंगलमयि ! वर् दो
सत्त्व पूर्ण मधुमय किरणो से भरे रंगे स्वर दो |
टूटे ध्वांत जटिल मायाक्रम ;
छँटे निराशाजन्यमलिन भ्रम |
स्नेहदीप्त उल्लास -मधुरिमा से जीवन भर दो |
यौवन-उष्मा मुकुलित हों तन |
तव उदार ममता पूरित मन |
बुद्धि धवल अद्ध्यात्म ज्योति से ज्योतित कर दो |
सरस्वती वंदन ----मंगलमयि ! वर् दो
सत्त्व पूर्ण मधुमय किरणो से भरे रंगे स्वर दो |
टूटे ध्वांत जटिल मायाक्रम ;
छँटे निराशाजन्यमलिन भ्रम |
स्नेहदीप्त उल्लास -मधुरिमा से जीवन भर दो |
यौवन-उष्मा मुकुलित हों तन |
तव उदार ममता पूरित मन |
बुद्धि धवल अद्ध्यात्म ज्योति से ज्योतित कर दो |
sham
लो यह दिन भी बीता शाम हो गयी
सूरज का रथ आया थक संध्या के द्वारे |
उन्मद हो द्वारिक ने पाटल के दल वारे ||
आगम से प्रियतम के मुग्धा सी सन्ध्या के --
ठगे ठगे नैन जैसे रह गये उघारे ||
लज्जा की लाली-सी दौड़ गयी दूर् तलक ;
प्रीति खुली मुग्धा बदनाम हो गयी |
लो यह दिन भी बीता शाम हो गयी ||
पूना की शाम कुछ ऐसी ही है
सूरज का रथ आया थक संध्या के द्वारे |
उन्मद हो द्वारिक ने पाटल के दल वारे ||
आगम से प्रियतम के मुग्धा सी सन्ध्या के --
ठगे ठगे नैन जैसे रह गये उघारे ||
लज्जा की लाली-सी दौड़ गयी दूर् तलक ;
प्रीति खुली मुग्धा बदनाम हो गयी |
लो यह दिन भी बीता शाम हो गयी ||
पूना की शाम कुछ ऐसी ही है
शुक्रवार, 1 अगस्त 2014
aabhas
प्रकृति गोद भरती फूलों से-
पर्वत सजते हिम -किरीट से |
नदियॉ प्रिय-आलिंगन करतीं -
कोकिल चातक चुहिल किलकते |
रजनी के अँचल में रजनी--
गन्धा -से तारक मुस्काते |
जब तक झरने झरते जाते गीत की सरगम के साथ शुभ सुबह
तब तक गीत लिखे जायेगे
पर्वत सजते हिम -किरीट से |
नदियॉ प्रिय-आलिंगन करतीं -
कोकिल चातक चुहिल किलकते |
रजनी के अँचल में रजनी--
गन्धा -से तारक मुस्काते |
जब तक झरने झरते जाते गीत की सरगम के साथ शुभ सुबह
तब तक गीत लिखे जायेगे
गुरुवार, 31 जुलाई 2014
aabhas
धरती की माटी चंदन है -
इसको माथे -शीश चढ़ालो |
यह वृंदावन भूमि अयोध्या ;
यह काशी कैलाश धाम लो ||
ये मेले त्यौहार दिवाली--
होली गंगा के नहान ये |
जब तक मधुर रंग धरती के-
तब तक गीत लिखे जायेंगे || पूना की रिमझिम में संस्कृति की झलक है
इसको माथे -शीश चढ़ालो |
यह वृंदावन भूमि अयोध्या ;
यह काशी कैलाश धाम लो ||
ये मेले त्यौहार दिवाली--
होली गंगा के नहान ये |
जब तक मधुर रंग धरती के-
तब तक गीत लिखे जायेंगे || पूना की रिमझिम में संस्कृति की झलक है
बुधवार, 30 जुलाई 2014
aabhas
प्रकृति में संगीत है लय है | रिमझिम रिमझिम जैसा वाद्य है | इसी की प्रेरणा से कवि की लेखनी से अक्षर रंग लेते है और मानस में राग जगाते है और फिर अलौकिक शक्ति का आभास होता है-- प्रिय की छवि आनन-आनन में
द्वार द्वार में मन्दिर अनुपम |
राग राग में प्रिय की सुमिरन
गीत गीत में उसका वंदन |
साँसो में प्रिय की पुकार के---
क्रन्दन का बोझिलापन है |
जब तक प्रिय का विरह चिरन्तन-
तब तक गीत लिखे जायेंगे
प्रात: वंदन के साथ ------------
मंगलवार, 29 जुलाई 2014
pyas
मन में ऐसी प्यास भरो रे----जैसी प्यास पपीहे के प्राणों में :
तड़पन भर जाती है ----------|
प्रिय की सुधा - वृष्टि मे रच-पच
गीत मधुर पी-पी जाती है |
ऐसी प्यास कि जिसको गंगा जल -
न तॄप्ति का कण दे पाता |
ऐसी प्यास कि जिससे टूक -टूक |
हो जाये जग से नाता
मीठी स्वप्निल अगन जगाए
मन में ----------------------- परम् पिता परमात्मा का वंदन शुभ सुबह
तड़पन भर जाती है ----------|
प्रिय की सुधा - वृष्टि मे रच-पच
गीत मधुर पी-पी जाती है |
ऐसी प्यास कि जिसको गंगा जल -
न तॄप्ति का कण दे पाता |
ऐसी प्यास कि जिससे टूक -टूक |
हो जाये जग से नाता
मीठी स्वप्निल अगन जगाए
मन में ----------------------- परम् पिता परमात्मा का वंदन शुभ सुबह
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