महाभारत- एक लघु विश्लेषण-महाभारत हिमालय के आँगन में नये धर्म रूपी सूर्य के उदय के लिये लड़ा गया महायुद्ध था |ऋत्त - - चक्र को व्यवस्थित करने के लिए महाक्रांति का शंखनाद था | राजतंत्र अंधा और विवेकहीन होकर सिंहासन पर बैठता है तो समझो समर का आगाज हो गया | कभी-कभी ऐसी प्रतिज्ञाऐं राजतंत्र से बँध जाती है जो धर्म के सूर्य को अस्त होता देखती रहतीं है पर कुछ कर नहीं कर पाती | अधर्म का अंधकार उन्हें कुछ देखने ही नही देता |अन्याय शोषण अनाचार जब हँसता है और नीति रोती है तो युद्ध होता है |भीष्म की प्रतिज्ञा धृतराष्ट्र की मह्त्व -आकांक्षा और पुत्र मोह ने सत्य को क्रांति के लिए विवश किया | जब धर्म सत्य न्याय विवेक ज्ञान लाक्षगृह में भेजे थे तब महाभारत के लिए कुरुक्षेत्र का मैदान तैयार हो चुका था | बस वह् सोच रहा था कि किसी तरह युद्ध ना हो तो अच्छा है इसमे अधर्म तो मरता ही है धर्म भी अश्रु बहाता है लेकिन जब अधर्म धैर्य हीन और अविवेकी होता है तो महाभारत निश्चित हो जाता है | जब द्यूत क्रीड़ा में छ्ल कपट के पासे डाले जाते है तब चक्र सुदर्शन धर्म को बचाने की तैयारी कर लेता है |और -और प्रतीक्षा -कब अधर्म समझे लेकिन ऐसा हुआ नही |अधर्म ने लज्जा का आवरण हटाने का प्रयास किया तब चक्र सुदर्शन ने लज्जा के चीर को बचाया और मन में युदाध का संकल्प ले लिया | चक्र ने फिर विनीत स्वर पाँच गॉव अधर्म से माँगें | माँगने पर अधर्म ने सूई के बराबर भूमि देने को मना कर दिया तो चक्र ने धर्म की रक्षा के लिए युद्ध की घोषणा कर दी महाभारत धर्म और न्याय की स्थापना के लिए हुआ | जब जब अधर्म नग्न नृत्य करेगा महाभारत को कोई नही रोक सकता ||
बुधवार, 20 अगस्त 2014
मंगलवार, 19 अगस्त 2014
ashadeep
जीवन के रंग भविष्य के संग- प्रधानमंत्री ने अबतक चले आ रहे योजना आयोग को समाप्त करके एक नए आयोग की संरचना की घोषणा करने पर विचार किया है उचित है क्योकि जितनी पुरानी स्वतंत्रता है लगभग उतना ही पुराना है आयोग | भारत जब स्वतन्त्र हुआ था तब समस्याओं का स्वरूप कुछ और था अब कुछ और है |भारत कृषि प्रधान देश है अधिकतार उद्योग कृषि पर निर्भर है कृषि के विकास के पर पहले भी योजनाओं में ध्यान दियागया और हरित् क्रांति के रुप में विकास हुआ |विकास तो अन्य क्षेत्र में भी हुआ है किन्तु 68 वर्षो में जितना विकास होना चाहिए था उतना नही ;भारत 75%से भी जनसंख्या खेती पर निर्भर है |खेती मानसून पर मानसून कभी खुश तो कभी नाराज कहीँ अनावृष्टि तो कहीँ अतिवृष्टि ऐसे में सिंचाई साधनों के विकास पर बल देने की जरुरत है नदियो का समन्वय समुद्र के पानी के पानी के परिशोधन की तकनीक विकसित हो | जब किसान खाली हो उसके लिये लघु योजनाओं को चलाना उत्तम है मानवीय संसाधन को सक्षम बनाने के लिये शिक्षा के हर क्षेत्र में गुणात्मक विकास हो |प्रकृति का उचित दोहन हो | छोटी -छोटी योजनाएँ हो जो कम समय में पूर्ण होकर फल दायी हो जिससे अन्तिम छोर तक विकास का प्रकाश पहुँचे | झोपड़ी में एक बल्व तो जले महानगरों में तो भव्य प्रकाश है | नया आयोग आशा का दीप बने जिसके प्रकाश में भविष्य के संग जीवन के रंगो की रंगोली सजे || इस पर आगे भी विचार लिखे जायेगे|| योजना आयोग के स्थान पर बनने वाले संस्थान के लिए आशा दीप नाम प्रस्तावित करती हूँ |
आशा भटनागर
आशा भटनागर
रविवार, 17 अगस्त 2014
krishan
मूल्य संचेतना के प्रतीक श्री कृष्ण- --कृष्ण पूर्ण मानवता की चरम कल्पना है | भारतीय परम्परा में कृष्ण 16 कलाओं के अवतार है सबके आकर्षण के केन्द्र कृष्ण समग्र चेतना संपन्न विराट् मानव है उनका व्यक्तित्व अनिर्वचनीय शब्दातीत और हर प्रकार की व्याख्या से परे है || इसका कारण है उनके व्यक्तित्व में निषेध तत्त्व नही है | उनके जीवन से जुड़ी सम्पूर्ण कथाएं मिथक हैं ;प्रतीक हैं | उन प्रतीको की सहज व्याख्या अनिवार्य हैं अन्यथा मिथ्या अभिप्राय लिए जाते हैं || कृष्ण ने सारी सड़ी गली परम्पराओ मर्यादाओं को तोड़ा और उनका पुनरुद्धार किया | इन्द्र के गर्व को खंडित करके वैज्ञानिक संचेतना के साथ गोवर्धन पर्वत उठाया था | इसका अभिप्राय यह है कि वर्षा पर ही निर्भर रहना उचित नही है और वर्षा के अतिरिक्त गो-वर्धन [गायों के सम्वर्धन } पर बल दिया | जिससे अर्थ व्यवस्था में सुधार हो | माखन लीला ; मटकी फोड्ना यह सब सामाजिक क्रांति के प्रतीक है जो श्रम करता है उसका फल उसे ही मिलना चाहिए | खेल-खेल में क्रांति का उद्घोष करना कृष्ण का नया क्रांति पथ था |आत्मा परमात्मा के बीच कोई भेद नही है इस तथ्य को समझाने के लिए चीर हरण लीला का प्रतीक प्रस्तुत किया || गोपियाँ प्राय: शुद्ध जीवात्माएँ है | उनके ऊपर का अन्तिम वासना रूपी वस्त्र को हटाना ही चीर हरण था | शांति के सारे उपाय करने के बाद राजतंत्र का गर्व को खण्डित करने के लिए कंस का वध किया और जरासंध का वध कराया |पूरा महाभारत का युद्ध मूल्य प्रतिषठापना के लिए ही हुआ था जिसके महानायक और सारथी कृष्ण ही थे शांति के सारे उपाय करने के बाद जब दुर्योधन ने "सूच्यग्रम् नैव दास्यामि विना युद्धेनकेशव " कहा तब कृष्ण ने महायुद्ध का शंखनाद किया और अर्जुन से कहा युद्धस्व विगतज्वर:-- अब बिना अन्तर्द्वन्द के युद्ध करना है कृष्ण धर्म के सारथी बने | कृष्ण स्वस्थ राजनीतिज्ञ स्वस्थ कूटनीतिज्ञ बनकर मूल्य संचेतना के प्रतीक बने | सामाजिक मूल्यों की रक्षा के लिए अंधविश्वास रूढियों का खंडन किया पर्यावरण शुद्धि के लिए कालिये नाग रुपी प्रदूषण को खत्म किया उनकी सारी रासलीला कुछ प्रतीकों के साथ सांस्कृतिक चेतना की प्रतीक थी |
गुरुवार, 14 अगस्त 2014
sundar h bharat mera
सुंदर है भारत मेरा -- ओ मेरे भारत के माथे सुंदर मुकुट विराजे |
इसको नमन करें||
भारत माँ का मुख रे उज्ज्वल चंदा - सा दमकावै |
झलमल हीरों की माला सा गंगाजल झलकावै ||
रे भइया इसको नमन करें ||
छ:ऋतुएं अप्सरियों- सी सतरंगी साड़ी पहने |
नर्त्तन करतीं आतीं पहने नव फूलों के गहने ||
रे--------------------------||
फूलों की घाटियॉ खगों के कलरव से भर जातीं |
गाते मेघ मल्हार ; कोकिला पंचम स्वर में गाती ||
रे------------------------------||
गेहूँ की बालियॉ ज्वार मक्का के दाने झरते ||
खेतों में रंगों -गंधों के वैभव सपने भरते ||
रे-------------------------||
पर्वों की धरती यह -होली फाग सुनाती आवै |
दीपो की माला से अम्बर को ललचाती जावै ||
रे----------------------------- || राष्ट्र को समर्पित
इसको नमन करें||
भारत माँ का मुख रे उज्ज्वल चंदा - सा दमकावै |
झलमल हीरों की माला सा गंगाजल झलकावै ||
रे भइया इसको नमन करें ||
छ:ऋतुएं अप्सरियों- सी सतरंगी साड़ी पहने |
नर्त्तन करतीं आतीं पहने नव फूलों के गहने ||
रे--------------------------||
फूलों की घाटियॉ खगों के कलरव से भर जातीं |
गाते मेघ मल्हार ; कोकिला पंचम स्वर में गाती ||
रे------------------------------||
गेहूँ की बालियॉ ज्वार मक्का के दाने झरते ||
खेतों में रंगों -गंधों के वैभव सपने भरते ||
रे-------------------------||
पर्वों की धरती यह -होली फाग सुनाती आवै |
दीपो की माला से अम्बर को ललचाती जावै ||
रे----------------------------- || राष्ट्र को समर्पित
बुधवार, 13 अगस्त 2014
geet
आज फिर गीत गुन गुनाना है-------------------------------
आज फिर गीत गुन गुनाना है
राग फिर प्यार का सुनाना है
बाँध ममता की डोर में फिर से-
आज बिछडो का दिल मिलाना है ||
कभी सतलुज की धार रूठी हो-
गर्म हो ब्रहमपुत्र का जल भी ||
आज गंगा के उजले अँचल में-
सारी नदियों का जल बहना है ||
ह्म सभी मोती एक लड के है
हमको लड़ के यहां न रह्ना है
तार सप्तक बजेंगे वीणा में-
स्वर तो फिर एक झन झनाना है |
वत्सला मेरी भारती माता -
इसके अंचल का कर्ज़ बाकी है |
चन्दनी गंध से भरी माटी-
इसको फिर शीश पर चढ़ाना है ||
आज फिर गीत गुन गुनाना है
राग फिर प्यार का सुनाना है
बाँध ममता की डोर में फिर से-
आज बिछडो का दिल मिलाना है ||
कभी सतलुज की धार रूठी हो-
गर्म हो ब्रहमपुत्र का जल भी ||
आज गंगा के उजले अँचल में-
सारी नदियों का जल बहना है ||
ह्म सभी मोती एक लड के है
हमको लड़ के यहां न रह्ना है
तार सप्तक बजेंगे वीणा में-
स्वर तो फिर एक झन झनाना है |
वत्सला मेरी भारती माता -
इसके अंचल का कर्ज़ बाकी है |
चन्दनी गंध से भरी माटी-
इसको फिर शीश पर चढ़ाना है ||
मंगलवार, 12 अगस्त 2014
matushree
हे मात्तु श्री |तुझको प्रणाम>> हे वन्दनीय :अभिनंद्नीय
हे मातुश्री ! तुझको प्रणाम ||
तू धरती माँ ! तू वसुधा है |
तेरा अॅचल है हरा भरा |
दोहन की कला सीखनी है--
जिससे अमृत नित रहे झरा |
तेरे पय से पोषित होकर
कर सकें जगत् में धन्य नाम |
हम करते है संकल्प मात
एकता बनेगी लौह शक्ति |
शत-शत करोड़ कंठो के स्वर
बन एक करेंगे मुखर भक्ति ||
सन्नद्ध रहेंगे हम तत्पर
तेरी रक्षा को अष्टयाम ||
हे मातुश्री ! तुझको प्रणाम ||
तू धरती माँ ! तू वसुधा है |
तेरा अॅचल है हरा भरा |
दोहन की कला सीखनी है--
जिससे अमृत नित रहे झरा |
तेरे पय से पोषित होकर
कर सकें जगत् में धन्य नाम |
हम करते है संकल्प मात
एकता बनेगी लौह शक्ति |
शत-शत करोड़ कंठो के स्वर
बन एक करेंगे मुखर भक्ति ||
सन्नद्ध रहेंगे हम तत्पर
तेरी रक्षा को अष्टयाम ||
सोमवार, 11 अगस्त 2014
PRNAM
हे ! अभिनन्दनीय भारत तुझे प्रणाम- भारत 68वां स्वतन्त्रता दिवस मनाने जा रहा है 15 अगस्त के प्रात: की सूर्य की पहली किरण हमारे तिरंगे का स्वागत करके कहेगी - हे ! अभिनन्दनीय भारत तुझे प्रणाम | हर वर्ष की भाँति के इस बार भी लाल किले से तिरंगा लहरा कर भारत की स्वतंत्रता का संदेश विश्व को मिलेगा | हम स्वतंत्र है अर्थात् अपने तंत्र के अधीन् हमारा अपना शासन -यह भाव जन -जन तक पहुँचाने की आवश्यकता है |अब वो समय आगया है |भारत का जन मानस "स्व" "तंत्र" के सही अर्थों को जाने | 68 वर्षो में भी अभी तक यह हमें लगता क्यों नहीं कि हम स्वतन्त्र है ? इसका कारण स्पष्ट है कि दलित गलित मानसिकता- -- ;लार्ड मेंकाले का प्रभाव जो हमारे मानस पर छाया हुआ है | हम अपनी संस्कृति ; अपनी भाषा ; परम्पराओ ; आदर्शों से दूर् होते जारहे है |इस बार सत्ता परिवर्तन हुआ है | कलम नई सरकार से ऐसी आशा करती है कि देश को लार्ड मेंकाले की नीली छाया से बचाये | आज सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति संचेतना आवश्यक है | हर क्षेत्र का आधार नैतिक चक्र हो |भौतिक -आध्यात्मिक मूल्यों का समन्वय हो राज्य की नीति शुद्ध और पारदर्शी हो | जन कल्याण की भावना की गंगा से ओत प्रोत हो |आर्थिक उन्नति के लिए भौतिक संसाधन और मानवीय संसाधनों की प्रगति आवश्यक है आध्यात्मिकता के गर्भ से उत्त्पन्न विवेक के सूर्य की भी आवश्यक है | मानस ऐसे ही भारत का अभिनंदन करना चाहता है - चेतना नयी हो; नये पथ का वरण
आगे ही आगे हों बढ़ते चरण |
अंधता के कूप में पड़े सड़े गले
जन -मन में सतत ज्योति का झरण |
मानव -संकल्पों के मुक्ति -दंड से-
जड़ता के भूत को भगाते रहो तुम | राष्ट्र को समर्पित भाव
आगे ही आगे हों बढ़ते चरण |
अंधता के कूप में पड़े सड़े गले
जन -मन में सतत ज्योति का झरण |
मानव -संकल्पों के मुक्ति -दंड से-
जड़ता के भूत को भगाते रहो तुम | राष्ट्र को समर्पित भाव
सदस्यता लें
संदेश (Atom)