सोमवार, 31 जुलाई 2017

शैशव से यौवन तक यौवन से संध्या तक
सुबह शाम  शहर गाँव  चल चल कर थके पाँव

सोमवार, 29 मई 2017

अहं ब्रम्हास्मि   तत्त्वं  - असि   सर्वं खलु इदं  ब्रह्म 

गुरुवार, 18 मई 2017

हमारा व्यक्तित्व कैसे बनता है क्या आपका पद आपके व्यक्तित्व को बनाता है क्या महेंगे  कपड़े या आभूषण  बंगला कार अन्य भौतिक सुविधाएँ आपके व्यक्तित्व का निर्माण करती है ! एक शब्द में कलम लिखेगी  `नहीं`!  आपके व्यक्तित्व को बनाता  है आपका सौम्य व्यवहार अपने पद के प्रति समर्पण ! कोई पद  कोई कार्य  छोटा बड़ा नही होता अपनी कार्य शैली से छोटे पद को भी rain bow का फ्रेम दे सकते है ! इस लेखनी केसंपर्क ऐसे कई व्यक्तित्व आये है जो बहुत बड़े पद पर रहकर भी  बहुत विनीत और कर्त्तव्य- निष्ठ है ! कई ऐसे भी  है जो अपनी कार्य शैली से नही अपितु बाह्य तड़क भड़क  से प्रभावित करते है उन्हें अपनी भाषा में बात करने में शर्म महसूस होती है ! अँगरेजी बोलेंगे चाहे ग़लत हो और लोग उनसे प्रभावित भी होते है !  हम अपने भावों विचारों को अपनी भाषा में सशक्त और प्रभाव शाली ढंग से व्यक्त कर सकते है ! भौतिक सुविधाएँ हमारा साधन है साध्य नही है साध्य तो हमारे पद की गरिमा और उससे जुड़े कर्तव्य है पद के अनुरूप ही वेश- भूषा का चयन हो इसी से व्यक्तित्व का बाह्य स्वरूप निखरता है व्यक्तित्त्व बनता है आत्म -विस्तार से! अब आत्म विस्तार  कैसे  हो यह अलग प्रश्न है !कई लोग समान व्यवसाय के ही लोगो से ही मिलना पसंद करते है उन्होंने अपने चारों तरफ़ एक होरा बनाया होता है जिसे अहम् ego  कहा जा  सकता है उससे बाहर निकलने में उन्हें    हीनता  महसूस करते है यह उनके संकीर्ण व्यक्तित्व का परिचायक है "समय नही मिलता है"  यह एक कारण उनके पास होता है जोलोग अहम् को तोड़कर सामाजिक गतिशीलता  में रूचि रखते है  उनका ही आत्म विस्तार होता है  वो समाज में अधिक पसंद किए जाते है ! अच्छा  व्यक्तित्व  मनोदैहिक गुणों का संगठित  रुप है इसमे अनेक पक्ष है जिसका अध्ययन मनोविज्ञान करता है ! यहां में प्रसादजी की कामायनी
 की कुछ पंक्तियां  उद्द्धृत करना चाहूँगी-"सब भेद भाव भुलवा कर दु;ख-सुख को दृश्य बनाता ;
                                   मानव कह रे !"यह मै हूँ "यह विश्व नीड़ बन जाता |









सोमवार, 7 मार्च 2016

shivatv

चल मन शिवत्व की ओर-महा शिव रात्रि का दिन शिव की पूजा का दिन | शिव की पूजा से पूर्व शिव के अर्थ और उन प्रतीकों के अर्थ को जान लेना चाहिए | शिव का अर्थ है लोक कल्याण | शिव लोक मंगल के देवता है | शिव के सारे  प्रतीक लोक मंगल के अमृत रस से भीगे है |  इस अमृत रस का पान वर्तमान के लिये अपेक्षित है | शिव की जटाओ में गंगा पवित्रता की ओर संकेत करती है |शुभ संकल्पों से मन को पवित्र करे और फिर राष्ट्र देवता को समर्पित हो | स्वार्थ परक क्षुद्र राजनीति को त्याग कर लोक हित का संकल्प धारण करना -यही वर्तमान से अपेक्षा हैं शिव के मस्तक की शोभा हैं चंद्रमा जो शीतलता का प्रतीक हैं | कैसी भी परिस्थिति हो स्वभाव  में उग्रता उचित नही है विशेषत: राजनीति  के क्षेत्र में जहां अनेक विरोधी तत्वो में सामंजस्य स्थापित करना होता हैं | स्वभाव में उग्रता से वाणी का विचलन हो जाता हैं बाद में व्यर्थ का वाद-विवाद होता हैं सारा विकास कार्य रुक जाता है | शिव त्रिनेत्र हैं जो विवेक का प्रतीक हैं लोक कल्याण को  ध्यान में रख कर सत्त-असत में अंतर करके निर्णय लेना ही विवेक है |दॄष्टि अपरिमित वर्ग के कल्याण पर होनी चाहिए यह श्रेष्ठ राजनीति की विशेषता है | शिव नील कंठी  है उन्होंने लोक  कल्याण के लिए विषपान किया | सफल नेतृत्व वही हैं जो सारी विषमताओं के जहर को पी कर  नव-निर्माण  कीबात करे | सर्प् विरोधी  तत्वो के प्रतीक है | शिव भस्म रमाते हैं अर्थात् वीत रागी है वैराग्य भावना हैं वर्तमान से यही अपेक्षा है शिव सिर्फ़ मृगछाला धारण करते हैं यह व्यक्तित्व की पारदर्शिता का प्रतीक है | राजनीति में ऐसा ही व्यक्तित्व चाहिए | शिव का नंदी धर्म का प्रतीक हैं धर्म वो जो नीति विवेक पर आधारित हो :जो अपरिमित वर्ग के कल्याण की भूमि पर आधारित हो  |पार्वती शिव की शक्ति है यह आत्मिक शक्ति  का प्रतीक हैं गणेश विघ्न विनाशक हैं |कर्त्तिकेय सेना के प्रतिनिधि है |वर्तमान से इन सब की अपेक्षा है | रे मन शिव की पूजा से पहले शिवत्त्व की ओर चल | शिवत्व ही शिव है-चल मन  शिवत्व की ओर | शिव रात्रि की शुभ कामना
 

सोमवार, 28 दिसंबर 2015

raj hans

मेरे मन का राज हंस बोला मुझसे: जीवन  विराट है इसमे कहीँ उपवन है तो पहाड  तो  पठार कही झरने है तो कहीँ दुर्गम घाटिया  कभी  घना जंगल | उपवन में फूल  तुम्हे ही खिलाने है | पहाड़ और पठार के बीच  तुम्हें ही पगडंडी  बनानी है | घने जंगल में से रास्ता तुमको ही निकालना है |  मेरे मन का राज हंस  बोला झरनो कि कल - कल में संगीत है उसे सुनो  फूलों की महक  अपने भीतर महसूस करो  | मन के राजहंस से मैंने कहा हम तो प्रकृति से बहुत दूर् जा रहे है  जीवन आपा धापी के मार्ग पर चल रहा है  निराशा घुटन  भौतिक सुखो की लालसा  उसे संग्रहण करने कामना  के कारण प्रकृति का  विद्रुप रुप ही नज़र  आता है | सुख और सुख यही लक्ष्य रहा गया है |मन के राज हंस ने कहा आओ मेरे पास बैठो सुनो यमुना के तीर से आने वाली ध्वनि इसमे है कृष्ण की वंशी के स्वर | जो हमेशा शुभता की ओर ले जाती है |मानस में शुभता -शुभ्रता होगी तभी संगीत सुन पाओगे |मन के राज हंस ने कहा कि सबको शुभ संध्या कहो |



















रविवार, 27 दिसंबर 2015

chunoti

अनचाही पीड़ा के कठोर करो ने भावों की भूमि को ऊसर बना दिया है इसको कैसे उर्वरा बनाया जाए प्रभु तुम्ही बताओ कौनसे जल  से  मानस के आँगन में सिंचाई करी जाए  जिससे ख़ुशियों की क्यारी बन सके प्यार के; ममता और वात्सल्य के गुलाब खिल सके | तभी संध्या के द्वार पर थका थका सा सूरज का रथ आया  और मानस को मीठी थपकी देकर कहने लगा  जीवन साँझ -उषा का आँगन है| भयंकर आँधी तूफान  के बाद भी निर्माण तो रुकता नही | समय का रथ आगे बढ़ता है कभी खुशी देता है तो कभी गम | इस रथ पर  बैठकर नन्हीं चिड़िया तूफान को चुनौती देती है  सबको देती है  एक नयी प्रेराणा देती है | शुभ संध्या

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015

akshar

अक्षर-  अक्षर ने सोचा चलो अक्षर से  मिलते है  अक्षर ने वन उपवन सब खोजे पर  जिस अक्षर से वो मिलना चाहता था  वो उसे  मिला ही नहीं | सारे ग्रन्थ  पढे  पर  अक्ष्र्र से अक्षर का  साक्षात्कार नहीं हो सका | यह अक्षर एक मन्दिर  के सामने खड़ा  हो गया | अक्षर ने मूर्त्ति से पूछा क्या तुमने अक्षर  को देखा है | मूर्त्ति कुछ मुस्करायी  मानो  कह रही हो अक्षर तो हर जगह  है  कॄष्ण की वंशी में अक्षर है | राधा की पायल की रुनझुन में  अक्षर है | कॄष्ण और राधा की रासलीला अक्षर की ही तो रास लीला है अपने भीतर देखो में वहीं मिलूंगा | अपने भीतर के अक्षर को पहचानो | अक्षर ही ईश्वर है ; ईश्वर ही अक्षर है | अ से अक्षर और यह अक्षर ही अक्षर से मिलाता है |
अक्षर ही परमात्मा है