गणतन्त्र का दर्पण कौन? 26 जनवरी 2015 को सम्पूर्ण भारत गणतन्त्र की 65 वी वर्षगाँठ मना रहा है |विश्व सरोवर में भारत सरसिज की भाँति सुशोभित है जिसकी पँखुड़ी-पँखुड़ी गणतन्त्र को नमन करती है| गणतन्त्र अर्थात् जनता का शासन || सुशासन हेतु नियमों का समूह लिपि बद्ध किया गया जिसे संविधान कहा जाता है | दृढ़ संकल्प के साथ संविधान सभा ने देश के हित में इसे स्वीकार करते लिखा -दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26-11-49 ई. {मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी;संवत् दो हजार छ:} को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत अधिनियमित और आत्म-अर्पित करते है | 26जनवरी 1950 को पूर्ण संकल्प और उत्सव के साथ संविधान लागू कर दिया गया |भारत मेंस्वस्थ गणतन्त्र स्थापित होगया | जनता की गरिमा का अरुणोदय हुआ | भारत का राष्ट्रपति भी वंशानुगत या राजवंश से सम्बन्धित ना होकर जन प्रतिनिधियों द्वारा निर्वाचित होता है | यह पद गणतन्त्र का गौरव है | आज पूरा भारत उत्सव के रंग में है लेकिन गणतंत्र एक ऐसा स्वच्छ दर्पण तलाश रहा है जिसमे वह अपनी छबि देख सके |गणतन्त्र उत्तरसे आने वाली सर्द हवाओं से भी कांपता है और पश्चिम की धूल भरी आँधी भी इसे डराती रहती है फिर जब वह् सुरक्षित जगह संसद में जाता है और वह सोचता है कि यहां तो समस्याओं का समाधान होगा लेकिन यहां का कोलाहल उसे घुटन देता है वह स्वयं को अस्वस्थ मह्सूस करता है | संसद गणतन्त्र का सबसे पहला और बड़ा दर्पण है जहां स्वस्थ वाद- विवाद के द्वारा समस्याओं की समाधान की छबि दिखती है लेकिन कुछ समय से ऐसा महसूस हो रहा है कि संसद जन-भावनाओं का दर्पण ना होकर रणक्षेत्र है |महत्त्व हीन समस्याओं को लेकर बहस करना नारे लगाना संसद की गरिमा के आगे प्रश्न वाचक चिह्न लगाता है | इससे देश का विकास अवरूद्ध होता है | गणतन्त्र क्षत-विक्षित होता है | छोटे हितों को लेकर संसद को रणक्षेत्र में बदलना अनुचित है | इससे विश्व क्षितिज पर भारत की छबि को ग्रहण लगता है |राजनैतिक दल गणतन्त्र के दूसरे दर्पण है इनके माध्यम से गणतन्त्र को प्राणवायु मिलती है | इस दर्पण का स्वच्छ होना बहुत आवश्यक है |राजनैतिक दल स्वार्थ की चौसर पर नीति की द्रौपदी को दाँव पर ना लगाये | राष्ट्र रूपी देवता को समर्पित होकर कार्य करे| अनुचित बहस ना करके कार्य शैली को जनता के अनुकूल बनाये शक्ति के मद में कर्तव्य ना कुचला जाए वह जन सेवक है जनता उनकी भाग्य निर्माता है वो नही |तीसरा दर्पण स्वस्थ मीडिया है | गणतंत्र की तस्वीर साफ दिखे इसलिए सब दर्पण अपनी अपनी सफाई करे | अंत में 66वे गणतंत्र को नमन |
रविवार, 25 जनवरी 2015
शनिवार, 27 दिसंबर 2014
mahamana
भारत रत्न स्व0 पंडित मदन मोहन मालवीय- 1861 में जन्मे इस लाल को पाकर इलाहाबाद की भूमि धन्य हुईं | मदन मोहन मालवीय भारत्तीय वसुंधरा के अनमोल रत्न है एक ऐसे रत्न जिसने आजीवन राष्ट्रीय मूल्यों की आराधना की | राष्ट्र की अस्मिता हिन्दी के लिये सतत् संघर्ष किया | वे बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे || वे शिक्षाविद् होने के साथ स्वतंत्रता सेनानी : राष्ट्रवादी ; राजनीतिज्ञ और समाज सुधारक थे |अपना राजनैतिक जीवन उन्होंने काँग्रेस से ही शुरु किया | 1886 में राष्ट्रीय काँग्रेस में प्रवेश किया | काँग्रेस अधिवेशान में चार बार सभापति बने |1909 में लाहौर अधिवेशन में ; दिल्ली अधिवेशन :1918;1931; कलकत्ता 1933 उन्होंने एक जगह यह कहा भी है कि मैं 50 साल से काँग्रेस के साथ हूँ | उन्होंने महात्मा गाँधी का पूरा-पूरा सहयोग किया | महामना की उपाधि महात्मा गाँधी ने ही उन्हें दी थी | हिन्दी से उन्हें विशेष अनुराग था | हिन्दी फले-फूले इसके लिए ही 1916 में बसंत पंचमी के दिन बनारस हिंदू विश्व विद्यालय की स्थापना की | वे देश भक्ति को सर्वोच्च शक्ति मानते थे| सत्यमेव जयते नारे को राष्ट्रीय पटल पर लाने वाले मदन मोहन मालवीय थे |1936 में हिंदू महासभा में प्रवेश किया | उन्होंने भारतीय संस्कृति के मूल तत्वों को प्रोत्साहान देने के लिए सदैव प्रयत्न किया | हिन्दी के कई समाचार पत्र ;पत्र -पत्रिकाओं का संपादन किया | हिन्दी के प्रबल समर्थक थे महामना के प्रयासों से ही देवनागरी सरकारी कार्यालयों और न्यायालय में स्थान पा सकी | गंगा -गायत्री उनकी प्रिय थी | ऐसी विभूति को नमन |
मंगलवार, 9 दिसंबर 2014
शब्दों का उपहार पहली बार-
तुम मेरे प्राणों की परिमिति
तुम मेरे स्पंदन की भाषा |
ओ मेरे उल्लास मधुर स्वर--
तुम मेरे जीवन की आशा ||
तुम मेरे श्वासो की सरगम
तुम गतिलय मेरे गीतो की
ओ मेरे उत्ताप-शिथिल अधि-
मानस की चेतना मदिर-सी |
तुम वासना मुक्त मादकता
तुम शाश्वत अनुराग-भरित-मन |
प्राणों का कर स्पर्श राग से-
तन मन में भार दिए ज्योति कण
तुम कोमल नवनीत - सदृश हो
शोभा-थकित्त चकित-सी पल-पल ||
वाणी मधुमय खग कल- कूजन |
मन जैसे पावन गंगा जल ||
तुम मेरे प्राणों की सम्बल ;
तुम मेरे मन की अवलम्बन |
अंतस् के गीतो की माला --
से अर्पित करता अभिनंदन
तुम मेरे प्राणों की परिमिति
तुम मेरे स्पंदन की भाषा |
ओ मेरे उल्लास मधुर स्वर--
तुम मेरे जीवन की आशा ||
तुम मेरे श्वासो की सरगम
तुम गतिलय मेरे गीतो की
ओ मेरे उत्ताप-शिथिल अधि-
मानस की चेतना मदिर-सी |
तुम वासना मुक्त मादकता
तुम शाश्वत अनुराग-भरित-मन |
प्राणों का कर स्पर्श राग से-
तन मन में भार दिए ज्योति कण
तुम कोमल नवनीत - सदृश हो
शोभा-थकित्त चकित-सी पल-पल ||
वाणी मधुमय खग कल- कूजन |
मन जैसे पावन गंगा जल ||
तुम मेरे प्राणों की सम्बल ;
तुम मेरे मन की अवलम्बन |
अंतस् के गीतो की माला --
से अर्पित करता अभिनंदन
शनिवार, 6 दिसंबर 2014
kalam
शिक्षक की कलम से- शिक्षक पद गरिमा से पूर्ण पद है वह राष्ट्र का भविष्य बनाता है ऐसे भविष्य निर्माता को बहुत को हल्के से लिया जाता है विशेषकर हिन्दी और संस्कृत के शिक्षक को अत्यन्त दयनीय बनाकर प्रस्तुत किया जाता है यहां तक कि जितने भी धारावाहिक या चलचित्र है उनमें शिक्षक को विदूषक के रुप में प्रस्तुत किया जाता है यह अनुभव इस कलम ने विद्यार्थी काल से किया है तब भी क्षोभ होता था आज भी है इस प्रसंग कई बार समाचार पत्रो में लिखा भी है || एक बार एक साक्षात्कार में कुछ लड़कियों से जीवनसाथी के चयन के बारे में पूछा तो प्रथम वरीयता थी प्रशासनिक अधिकारी की दूसरी वरीयता चिकित्सक तीसरी इंजीनियर चौथी वरीयता में बेचारा शिक्षक जब मेरे परिवार में मुझ से पूछा गया तो मैंने चौथी वरीयताको अपनी प्रथम वरीयता बताया बात यहां नहीं खत्म होती शिक्षक में भी भेद करके देखा जाता है यह हिन्दी का शिक्षक है या अँग्रेजी का |अँगरेजी का होगा स्मार्ट होगा और हिन्दी का होगा तो मोटा चश्मा पहने होगा विदूषक की कल्पना साकार की जाती है मुझे आज तक यह बात समझ में नहीं आयी कि अँगरेजी जानकर कौन सा ज्ञान बढ़ जाता है हमारे संस्कृत साहित्य में सारा ज्ञान है और विदेशियों ने इस का अध्ययन किया और अपनी मोहर लगा दी | योग विश्व को भारत की देन है मानसिक दासता से ग्रस्त लोगो को योग कहने में शर्माते है योगा कहते है |अँगरेजी का मारा समाज किधर जा रहा है एक साधारण व्यक्ति रोटी बाद में खायेगा अपने बच्चों को तथाकथित अँगरेजी स्कूल में पढाकर गर्व महसूस करता है चाहे उसको अँगरेजी समझ ना आती हो इन्ही अंगरैज़ी स्कूलों में एक शिक्षिका का नए तरीके से अपमान होता है और एक समाचार बन कर रह जाता है | एक बच्ची दो चोटी करके काजल लगाकर आती है तो उसे सजा मिलती है| कब मेरा देश इस दलित गलित मानसिकता निकलेगा शिक्षकत्व कब आदर पायेगा कब मेरी साथ यह कहेगा गर्व से कहो कि हम शिक्षक है हिंदी पढ़ाते है जो अँगरेजी से ज्यादा शक्ति शाली है जो हमारे राष्ट्र की अस्मिता है
रविवार, 23 नवंबर 2014
yoga
योग- किसी भी देश की प्राथमिक आवश्यकता स्वस्थ मानवीय संसाधन है| तन और मन से स्वस्थ नागरिक देश की प्रथम आवश्यकता है | तभी प्राकृतिक संसाधनों का सही दोहन सम्भव है| शारीरिक और मानसिक क्रियाओं का संतुलन ही स्व में स्थित रख सकता है इसमे योग की भूमिका महत्व पूर्ण है |योग पर् बहुत चर्चा हो चुकी है |योग के प्रति विश्व भर में बहुत आकर्षण है इसी कारण यह दर्शन विशेष रूप से प्रतिष्ठित है भारत में 6:दर्शन विशेष है -वेदांत: सांख्य: न्याय : वैशेषिक: मीमांसा:और योग | योग भारत की श्रेष्ठतम अध्यात्म निधि है इसकी व्याख्या पतंजलि की पुस्तक योग सूत्र में मिलती है || योग की परिभाषा है- योग: चित्तवृत्ति निरोध: | चित्तवृत्ति के वशीकरण को कहते है चंचल मन को वासनाओ को रोकता है ऐसा योग राज योग है यही मन की चंचल वृत्ति को रोकता है योग के 8अंग होते है | 1 यम अर्थात् संयम - इसके पाँच प्रकार है- 1अहिंसा 2सत्य 3 अस्तेय 4 ब्रह्मचर्य 5अपरिग्रह | 2 नियम भी पाँच है शौच :संतोष:तप स्वाध्याय:: ईश्वर प्रणिधान| 3 आसन शरीर का अनुशासन है| 4 प्रणायाम श्वासो का अनुशासन है 5 प्रत्याहार भीतर से भोजन करना है प्रत्याहार भीतर से आनंद की खोज है6 धारणा -इष्ट में चेतना को केन्द्रित करना है |7 ध्यान मेडिटेशन है धारणा की अखंड धारा को ध्यान कहते है |8-समाधि आत्मा का परमात्मा से एकाकार होने का प्रयास |इसके दो स्व्ररुप है -1 निर्विकल्प- जिसमें केवल तू ही तू का आभास होता है अखंड अद्वेत का आभास 2सविकल्प मै ही तू ही का आभास | हठयोग अलग है इसमे मेरुदंड के भीतर निम्न भाग में कुण्डलिनी शक्ति होती है जो सर्पिणी के आकार की होती है जिसे साधना से ऊर्ध्वमुखी किया जाता है क्रमश: 7 चक्र पार किए जाते है- 1 मूलाधार 2 स्वाधिष्ठान 3मणिपूर 4 अनाहत 5विशुद्ध 6 आज्ञाचक्र 7मस्तिष्क के पीछे के भाग में1000 पँखुड़ी वाला उलटे कमल की आकृति का सह्स्रार चक्र होता है इस में अनन्त प्रकाश होता है अनाहत नाद होता है यहां अमृत झरता है यह हठयोग है |
गुरुवार, 13 नवंबर 2014
bachpan
बाल दिवस पर विशेष -बचपन -- बचपन गुलाब है बचपन गेंदे का खिलता फूल है बचपन में मौलश्री खिलती है बचपन में जुही की सुगंध है सारा का सारा बचपन हार सिंगार है यही बचपन भारत के भविष्य के आँगन में रंगोली सजायेगा इसको सहजना आपका हमारा सबका कर्तव्य है किन्तु ऐसा हो नही हो रहा है कहीँ गुलाब निराश हताश सड़क पर सोने को मजबूर या फिर पेट की आग बुझाने के लिये रोटी के लिये भीख माँगने को मजबूर |बालश्रम पर अनेकानेक: विचार: कानून है लेकिन बालक की रोटी की क्या व्यवस्था है इसकी भी मूल आवश्यकता है जमाने के साथ चलने की इस बचपन की भी इच्छा है इसीलिये बचपन कहीँ बर्तन साफ़ करता है तो कहीँ मज़दूरी करता है उसपर भी फटकार | जब कहीँ से कुछ नही मिलता तो ग़लत रास्ते पर चल पड़ता है कहीँ होमवर्क ना करने पर इतनी सजा पाता है कि रोंगटे खड़े हो जाते है | शिक्षा मन्दिर मौलश्री की सुरक्षा नही कर पर रहे है जूही अपनी सुगंध तलाश रही है | केवल बाल दिवस मनाना समस्या का समाधान नहीं है नेहरू जी ने देश के भविष्य को अपना जन्मदिन समर्पित किया था राजनीति को नही | मेरा समस्त बौद्धिक वर्ग से निवेदन है कि मनुष्य के पिता को बचाने का संकल्प ले | किसी ड्रेकुला से कली को बचाने का संकल्प ले | बचपन मनुष्य का पिता है क्योकि पाँच साल की उमर में उसका भविष्य बन जाता है| परिवार विद्यालय समाज सेवी संस्थाओं पर यह दायित्व आ जाता है कि वे इस बात पर ध्यान दे कि उनके संस्कारों को बनाने के लिए जो भोजन परसा जाता है वह शुद्ध हो | खिलते बचपन को नमस्कार हँसते झिलमिलतारे जैसे बचपन को नमस्कार
बुधवार, 29 अक्टूबर 2014
विचार विश्लेषण - सच्चा वीर कौन ? जो सात्विक शक्ति का प्रयोग इसलिये करते है कि मानवता की अखंड मूर्ति खण्डित ना हो |लोकमंगल का धरातल स्थिर रहे | सच्चे वीर धीर वीर गम्भीर होते है सत्व गुण सागर में उनका अन्त;करण निरंतर स्नान करता है |वे लोक कल्याण के पथ पर जब चलते है तो प्रकृति उनकी सहचरी हो जाती है| बादल उनको छाया देते है | चाँद तारे उनके सत्व गुण के गवाह बनते है वृक्ष उनके लिए पंखा झलते है फूल उनका पथ सजाते है सुगन्धित करते है |सच्चे वीर किसी भी कारखाने में तैयार नही होते वे तो स्वत: भीतर ही भीतर पोषित होते है वे बात बात पर उत्तेजित डराते धमकाते नही है वे एक बहुत बडे लक्ष्य के लिए शक्ति को सहज कर रखते है | वीर आत्मचिंतन करते है समय के अनुसार कभी पीछे हटना है तो भी ठीक | राम ने युद्ध करने से पहले रावण को समझाने के लिए बहुत प्रयास किए किन्तु रावण जब नही माना तो मूल्यों की रक्षा के लिए युद्ध किया कृष्ण भी परिस्थिति वश युद्ध क्षेत्र छोड़ने के कारण रणछोड़ कह्लाये कृष्ण शक्ति का अपव्यय नही करना चाहते थे | उनको अपनी शक्ति धर्म की रक्षा के लिए बचानी थी | सच्चे वीर भीतर ही भीतर ही मार्च करते है समय आने पर बलिदान करने में पीछे नहीं रहते है | आज की शाम वीरों के नाम
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